नाथ सम्प्रदाय की हत्या के बाद : साम्प्रदायिकता का नया युग

पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कि किस तरह गोरखनाथ मठ के तीन ठाकुरों क्रमशः दिग्विजयनाथ ( नान्हू सिंह ) , अवैद्यनाथ ( कृपाल सिंह बिष्ट ) और आदित्यनाथ ( अजय सिंह बिष्ट ) ने नाथ सम्प्रदाय की हत्या की और उसे कट्टर हिंदुत्व का रंग दिया ।

अब हम देखेंगे कि किस तरह इन्होंने साम्प्रदायिकता को जन्म दिया और पूरे देश को दंगो की आग में झोंक दिया । जिसका परिणाम यह रहा कि आज़ादी के बाद भारत हिन्दू- मुसलमान जंग का मैदान बन गया ।

इसकी शुरुवात होती है राजस्थान के राजपूत महंत दिग्विजय नाथ ( नान्हू सिंह ) से । गोरखनाथ मठ से राजनीति में भाग लेने वाला यह पहला महंत था । अपने शुरुवाती दिनों में यह कांग्रेस में था लेकिन असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद इसने हिन्दू महासभा का दामन थाम लिया । इसे 1935 में गोरखनाथ मठ का महंत बनाया गया । उसके बाद इसने 1935 से 1969 तक उत्तर भारत में भयानक स्तर पर साम्प्रदायिकता फैलाई और हिन्दू बनाम मुस्लिम के विवाद को जन्म दिया ।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि नान्हू सिंह से दिग्विजयनाथ बना ये व्यक्ति राम मंदिर की संकल्पना को जन्म देने वाला पहला व्यक्ति था । उससे पहले किसी ने भी राम मंदिर की संकल्पना प्रस्तुत नहीं की थी । उसने हिन्दू-मुस्लिम की खूनी और साम्प्रदायिक राजनीति में अपना भविष्य काफी पहले देख लिया था । इसी का परिणाम था कि उसने अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर होने का दावा किया । यह हैरतअंगेज होने के साथ साथ हास्यास्पद भी था । शुरुवाती दिनों में इसे किसी ने गंभीरता से नहीं लिया।

दिग्विजयनाथ जैसे व्यक्ति के लिए जरूरी था कि लोग उसकी कल्पना को सच मानें । वह महत्वाकांक्षी और जिद्दी व्यक्ति था । उसकी महत्वाकांक्षा को बल देने का काम हिन्दू महासभा ने किया । महासभा ने दिग्विजयनाथ को हिन्दू महासभा , यूनाइटेड प्रोविंस (अब का उत्तर प्रदेश ) का अध्यक्ष बनाया ।

महासभा के साथ मिलकर उसने जो खूनी चाल चली उसका परिणाम बहुत भयानक हुआ ।

30 जनवरी , 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हो गयी ।  इस हत्या में परोक्ष रूप से दिग्विजयनाथ भी शामिल था । इस हत्या में शामिल होने के कारण उसे जेल भी जाना पड़ा ।  कहा जाता है कि गांधी की मौत के तीन दिन पहले दिग्विजयनाथ ने एक जगह कार्यकर्ताओं को उनकी हत्या करने के लिए उकसाया था । इसके लिए उसे 9 महीने तक जेल में रहना पड़ा । इस घटना से दिग्विजयनाथ और उसके संगठन की बहुत बदनामी हुई । उसकी राजनीति फीकी पड़ने लगी ।

अब दिग्विजयनाथ के लिए जरूरी था कि अपनी राजनीति को जिंदा रखने के लिए वह कोई नया मुद्दा पकड़े । वह मुद्दा था अयोध्या का राम मंदिर मुद्दा । वही राम मंदिर जिसकी संकल्पना उसने की थी ।  इसमें दिग्विजयनाथ का साथ दिया विनायक दामोदर सावरकर ने । ये दोनों ही अखिल भारतीय रामायण महासभा के सदस्य थे ।

गांधी की हत्या के बाद अपने अस्तित्व को बचाने के लिए महासभा ने बाबरी मस्जिद के सामने नौ दिन तक रामचरितमानस के पाठ का कार्यक्रम करवाया । इसके आखिरी दिन बाबरी मस्जिद के अंदर चोरीछिपे राम और सीता की मूर्ति पहुंचाई गई । कहते हैं इसमें दिग्विजयनाथ का ही हाथ था । इस ऐतिहासिक धूर्तता भरे कदम से उसे नई जान मिल गई । परिणामस्वरूप दिग्विजयनाथ को 1950 में हिंदू महासभा का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया ।
इससे उत्साहित होकर उसने 1951 में होने वाले प्रथम आम चुनावों में भाग लिया जिसमें उसे कांग्रेस के नेता और स्वतंत्रता सेनानी सिंहासन सिंह ने बुरी तरह पराजित किया । आगे चलकर सिंहासन सिंह ने लगातार दो बार दिग्विजयनाथ को पराजित किया ।

लेकिन 1967 में  स्थितियां बदल गयीं । सिंहासन सिंह जो इंदिरा जी से असंतुष्ट थे , चुनाव नहीं लड़े  । जिसका फायदा दिग्विजयनाथ को हुआ और वह चुनाव जीत गया । जल्द ही 1969 में दिग्विजयनाथ की मृत्यु हो गयी ।

इसके बाद दिग्विजयनाथ का स्थान लिया मठ के दूसरे ठाकुर अवैद्यनाथ यानी कृपाल सिंह बिष्ट ने । उसने विरासत में मिली साम्प्रदायिक राजनीति को अगले स्तर पर पहुंचाने का काम किया । वह 1970 से 1977 तक चुनावों में भाग लेता रहा ।  लेकिन 1977 में इंदिरा विरोधी लहर आने के बाद अवैद्यनाथ ने सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया ।

एक लंबे अंतराल के बाद वह राजनीति में दुबारा 1989 में प्रकट हुआ । इससे पूर्व उसने 1984 में श्रीरामजन्मभूमि यज्ञ समिति बनाई और गोरखपुर समेत देश विभिन्न हिस्सों में अपने गुरु दिग्विजयनाथ के एजेंडे का विस्तार किया । नतीज़न , 1989 के चुनाव में उसे बड़ी जीत हासिल हुई ।

अवैद्यनाथ ने अपने गुरु की संकल्पना को आंदोलन का रूप दिया । उसने भी अपने गुरु की तरह भांप लिया था कि अपनी राजनीति को जिंदा रखना है तो जरूरी है कि देश में साम्प्रदायिक माहौल कायम रहे । लिहाज़ा , जो काम उसके गुरु नहीं कर पाए थे उस काम को अवैद्यनाथ ने अंजाम दिया ।

1989 में ही विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने इलाहाबाद में जिस धर्म संसद का आयोजन किया, उसमें अवैद्यनाथ के भाषण ने ही राम मंदिर आंदोलन का आधार तैयार किया था । इस धर्म संसद के तीन साल बाद ही बाबरी ढांचा ढहा दिया गया । तब एक फरवरी 1989 को स्टेट्समैन ने अपनी खबर में लिखा था,

‘गोरखपुर के महंत अवैद्यनाथ ने खास तौर पर उल्लेख किया है कि क़ुरान मुस्लिमों को दूसरों के धर्म स्थलों पर मस्जिद बनाने से रोकती है…. और हमें किसी संघर्ष टालने के लिए किसी दूसरी जगह पर राम मंदिर बनाने की सलाह दी जा रही है. यह सलाह ठीक वैसी ही है, जैसे रावण से युद्ध टालने के लिए भगवान राम को किसी दूसरी सीता से विवाह करने के लिए कह दिया जाए.’

राम मंदिर आंदोलन में अवैद्यनाथ की भूमिका कितनी थी, इसका अंदाजा लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है । आयोग ने इस आंदोलन के जरिए देश में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश का जिन-जिन अहम लोगों को जिम्मेदार माना था, उनमें अवैद्य नाथ भी एक था । 

अवैद्यनाथ का फायदा विहिप और भाजपा जैसे संगठन एवम राजनीतिक दल को भी हुआ ।

अवैद्यनाथ की इन कारस्तानियों का नतीज़ा क्या हुआ ,  ये सभी को पता है । 6 दिसंबर , 1992 को बाबरी विध्वंस के बाद पूरा देश दंगों की आग में जला । तमाम जगहों पर बम विस्फोट हुए । हज़ारों लोगों की जान गई । इन सब से उबरने में देश को दो दशक से भी ज्यादा समय लग गया ।

इस बीच अवैद्यनाथ का उत्तराधिकारी एक तीसरा ठाकुर यानी आदित्यनाथ विरासत में मिली साम्प्रदायिकता और दंगों की राजनीति को आगे बढ़ाता रहा । उसने पूर्वांचल के कई जिलों में साम्प्रदायिक दंगों को अंजाम दिया जिसमें सबसे ज्यादा कुख्यात वह 2007 के गोरखपुर दंगो में हुआ ।

2017 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद वह 2019 के लिए बेहद खतरनाक ढंग से अगली चाल चलने की फिराक में है । उसका बार बार अयोध्या भाग कर जाना , दीपावली का भव्य आयोजन ,बार बार अयोध्या की बात करना , ये सब  यूँ ही नहीं है । गोरखपुर की हार के बाद उसकी तिलमिलाहट किस कदर बढ़ गयी होगी इसका अंदाज़ा आप आसानी से लगा सकते हैं ।

कुल मिलाकर ...ये तीनो ठाकुर गांधी के हत्यारों की परंपरा के लोग है । यह नफरत और साम्प्रदायिकता  के वाहक हैं । इन्होंने न सिर्फ नाथ सम्प्रदाय की हत्या की है बल्कि भारत में  साम्प्रदायिकता के नए युग की शुरुवात भी की है ।

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