ज्योतिबा जीवन कथा.8
' जब ज्योतिबा ने दूसरी शादी से किया इनकार...
ज्योतिबा को लंबे समय तक कोई संतान नहीं हुई थी । उनके पिता गोविंदराव की उम्र ढल रही थी । वे चाहते थे कि अगर संतान न हो तो ज्योतिबा दूसरी शादी कर लें । उस समय ऐसा करना बेहद आम बात थी । उन्होंने ज्योतिबा के ससुराल वालों को भी इसके लिए मना लिया था । लेकिन ज्योतिबा ने इसके लिए स्पष्ट मना कर दिया । उस समय उन्होंने जो कहा वो आज भी प्रासंगिक है -
' संतान नहीं होती इसलिए किसी भी स्त्री को बांझ कहना बहुत बड़ी निर्दयता है । संभव है , उसके पति में दोष हो । ऐसी स्थिति में अगर वह स्त्री कहे कि मुझे दूसरा पुरुष करना है तो उस पुरुष पर क्या बीतेगी ? '
सिर्फ संतानोत्पत्ति के लिए दूसरा विवाह करने की प्रथा ज्योतिबा को बिल्कुल भी पसंद नहीं थी । उन्होंने आखिर तक अपने पिता और सगे संबंधियों की बात नहीं मानी और दूसरा विवाह नहीं किया ।
फिर , सवाल उठता है कि यशवंत कौन था ?
उनके गोद लिए हुए पुत्र ' यशवंत ' की कहानी दिलचस्प है । लेकिन उनसे पहले ज्योतिबा द्वारा स्थापित ' बालहत्या प्रतिबंध गृह ' के बारे में जान लेते हैं ।
उन दिनों विधवाओं की स्थिति बहुत दयनीय थी , खासकर ब्राह्मण विधवाओं की । 25 जुलाई , 1859 को सरकार ने विधवा विवाह कानून पारित किया था लेकिन उससे विधवाओं की सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ । दूसरी ओर बालहत्या की बढ़ती दर भी चिंताजनक थी ।
ज्योतिबा ने 1863 में एक बालहत्या प्रतिबंधक गृह शुरू किया । वहां कोई भी विधवा आकर बच्चा पैदा कर सकती थी । इससे पूर्व ऐसे बच्चों की लोकलाज के डर से हत्या कर दी जाती थी या ऐसी विधवाएं आत्महत्या कर लेती थीं । ज्योतिबा ने इस गृह के बड़े बड़े पोस्टर हर जगह लगवाए । उन पर लिखा था -
" विधवाओं , यहां अनाम रहकर निर्विघ्न जचगी कीजिये । अपना बच्चा साथ ले जाएं या यही पर रख दें यह आपकी मर्जी पर निर्भर रहेगा । यहां रखे बच्चों की देखभाल अनाथाश्रम करेगा । "
यह घटना सनातनियों के घर में बम फूटने जैसी थी । वे आपे से बाहर हो गए ।
" क्या समझता है ये आदमी अपने आप को ? होता कौन है ऐसा अनाथाश्रम बनाने वाला ? वे जानते थे ज्योतिबा के अलावा ऐसा करने वाला कोई और नहीं हो सकता लेकिन वे उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाते थे ।
यह बालहत्या प्रतिबंधक गृह एक गैर ब्राह्मण और शूद्र माने जाने वाले ज्योतिबा द्वारा मुख्यतः ब्राह्मणों की विधवाओं के लिए शुरू किया गया था । लेकिन विडंबना देखिए कि इसका सबसे ज्यादा विरोध ब्राह्मणों ने ही किया ।
इस घटना से इतर एक और घटना घटी । पूना के गंजपेठ में केशोपन्त सिन्दी के घर में रहने वाली एक ब्राह्मण विधवा युवती काशीबाई , जो वेश्यावृत्ति की राह पर भटका दी गयी थी , ज्योतिबा और सावित्री से मिली । काशीबाई गर्भवती थी और आत्महत्या करने जा रही थी । लेकिन ज्योतिबा और सावित्री ने उसे बचा लिया । इसी काशी से यशवंत का जन्म हुआ जिसे फुले दंपत्ति ने गोद लिया । उन्होंने उसे पुत्र मानकर उसका पालन पोषण किया । 10 जुलाई , 1887 को ज्योतिबा ने अपनी वसीयत बनाई और उसमें यशवंत को विधिवत पुत्र के सारे अधिकार दिए ।
यशवंत ज्योतिबा के मानस पुत्र थे । उनमें भी ज्योतिबा की तरह प्रगतिशीलता , सेवाभाव और त्याग की भावना थी । उनकी मृत्यु अपनी माता सावित्री के साथ तब हुई जब प्लेग पीड़ितों का इलाज करने के दौरान अपनी मां के साथ वह भी प्लेग का शिकार हो गए ।
ज्योतिबा ने अपनी पत्नी के साथ - साथ बेटे और बहू को भी पढ़ाया । जीवन के अंत समय में 1890 के आसपास उन्हें लकवा मार गया था । इस अवस्था में भी उनके अंदर इतना जुनून था कि उन्होंने बाएं हाथ से " सार्वजनिक सत्यधर्म " नामक पुस्तक लिखी जो उनकी मृत्यु के एक वर्ष बाद प्रकाशित हुई ।
28 नवम्बर , 1890 को युगपुरुष महात्मा ज्योतिबा फुले की मृत्यु हुई । उनके गुजरने के वर्षो बाद भी आज उनकी शिक्षा , उनके विचार , उनका जीवन , सब कुछ हमारे लिए अनुकरणीय और मार्गदर्शक है । हम और हमारी आने वाली पीढियां उनके जीवन और विचारों को हमेशा अपने हृदय में संजो कर रखेंगी ।
आज की सीरीज का उद्देश्य सिर्फ इतना था कि महात्मा ज्योतिबा के जीवन और कार्यों की छोटी सी झलक आप लोगों तक पहुंच सके ।
नमन ..उस महान नायक को.
Comments
Post a Comment