ज्योतिबा जीवन कथा...3
घर से निकाले जाने के बाद ज्योतिबा की आर्थिक हालत जब ठीक हुई तो उन्होंने पुनः स्कूल शुरू किया । यह स्कूल एक मुसलमान के घर में शुरू किया गया । उस दौर के सभी धर्मभीरु और स्वयं को हिन्दू कहने वाले लोग , जिनके लिए ज्योतिबा ज्ञान की अलख जगा रहे थे उन्होंने उनकी घोर उपेक्षा की । वह उनके प्रयासों को तुच्छ नज़रों से देखते रहे ।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ज्योतिबा ने शिक्षा देने के लिए कभी भी उस दौर के ब्राह्मणों की तरह न भेदभाव किया न ही बदले में कुछ लिया । उन्होंने अपने जीवनकाल में रोजी रोटी के लिए कभी सब्जियां बेचीं , कभी दर्जी का काम किया , कभी खेती की तो कभी कठोर शारीरिक श्रम किया ।
ज्योतिबा के दुबारा स्कूल शुरू करने के बाद स्कूल में आने वाले छात्रों की संख्या बढ़ने लगी । इससे प्रेरित होकर अगले चरण के रूप में उन्होंने 3 जुलाई 1857 को लड़कियों के लिए भी एक स्कूल खोला । ज्योतिबा ऐसे पहले भारतीय थे जिन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोलने की दूरदर्शिता दिखाई ।
लेकिन इस कार्य में भी ज्योतिबा के सामने शिक्षक न मिलने की समस्या सामने आने लगी । जब ज्योतिबा को तमाम कोशिशों के बाद पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक न मिला , तब उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री को इस काम के लिए तैयार किया । लगभग 4 साल का कोर्स पूरा करने के बाद सावित्री प्रशिक्षित शिक्षिका बन गयी । वह भारत की पहली शिक्षिका थीं ।
सावित्री के स्कूल में पढ़ाने से परम्परावादी समाज की चूलें हिल गयीं । घर से बाहर कदम रखकर समाज में खुले तौर पर काम करने वाली वह पहली भारतीय महिला थीं । इससे बौखलाए हुए परम्परावादी और धर्मभीरु लोगों ने सावित्री की छीछालेदर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । जब वह घर से बाहर निकलती तो लोग उन पर थूकते , उन्हें गालियां देते , उनको पत्थरों से मारते और उन पर गोबर और मल फेंक दिया करते थे ।
लेकिन धन्य हैं वह महिला , नमन है उनको , कि इस जानलेवा अपमान की आग पीकर भी वह शांति से अपना काम करती थीं । वह अक्सर लोगों से हाथ जोड़कर कर विनम्रता से कहती थी -
" भाईयों , मैं तो आपको और आपकी इन छोटी बहनों को पढ़ाने का पवित्र काम कर रही हूं । मुझे बढ़ावा देने के लिए शायद आप मुझपर गोबर- पत्थर फेंक रहे हैं । मैं यह मानती हूं कि यह गोबर या पत्थर नहीं , फूल हैं । आपका यह काम मुझे प्रेरणा देता है कि इसी तरह मुझे अपनी बहनों और भाईयों की सेवा करनी चाहिए । ईश्वर आपको सुखी रखें । "
फुले दंपत्ति की इस जिजीविषा और दृढ़ निश्चय की बदौलत कई दिक्कतों , संकटों और विरोधों के बाद भी स्कूल चलता रहा । इन कार्यों से ज्योतिबा और सावित्री ब्राह्मण और अन्य ऊंची जातियों के लिए नीच और पापी बन गए । वहीं दूसरी ओर पूरे महाराष्ट्र में वह अछूतों और महिलाओं के मसीहा बन गए । अब लोग उनके प्रयासों को जानने और समझने लगे थे ।
क्रमशः....
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