मंगल पांडेय : संयोग से बना और थोपा हुआ नायक
मंगल पांडेय के बारे में आम धारणा है कि वह वीर देशभक्त सैनिक थे और उनकी कथित शहादत के असर की वजह से 1857 की क्रांति घटित हुई.
यह इतिहास के नाम पर अनेक बार बोला गया वह झूठ है जो अब हमारे जेहन में भीतर तक बैठ चुका है. इस झूठ को स्थापित करने में बायस्ड भारतीय इतिहासकारों का जितना रोल है उतना ही रोल बॉलीवुड का भी है. दोनों ने एक साधारण सैनिक को इतिहास का प्रमुख नायक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. यह हरकत न सिर्फ इतिहास के साथ धोखाधड़ी है बल्कि 1857 के विद्रोह में मारे गए सैकड़ों सैनिकों की मृत्यु का मज़ाक भी है.
मंगल पांडेय कौन था ? कहाँ का रहने वाला था ? उसकी सेना में भर्ती कब हुई थी ? इस संदर्भ में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती है. मंगल पांडेय के जन्मस्थान को लेकर आज भी मत विभिन्नता बनी हुई है. कुछ लोग उनका जन्मस्थान बलिया मानते हैं तो कुछ फैज़ाबाद. उनके माता-पता कौन थे , यह भी किसी को नहीं पता है. उनके पिता का नाम कई जगह दिवाकर पांडेय बताया जाता है जो कि फर्जी है.
इतिहासकार रुद्रान्ग्शु मुखर्जी ने अपनी पुस्तक ' अवध इन रिवोल्ट 1857-58 : अ स्टडी ऑफ पॉपुलर रेजिस्टेंस के हवाले से मंगल पांडेय से संबंधित कई मिथकों और भ्रांतियों का पुरजोर खंडन किया है. जो लोग इनके बारे में नहीं जानते हैं उन्हें बता दूँ के ये प्रेसिडेंसी कॉलेज कोलकाता , जेएनयू , एडमंड हाल ऑक्सफोर्ड से पढ़े हैं और आधुनिक भारतीय इतिहास पर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से डी.फिल किये हुए हैं. यह कलकत्ता विश्विद्यालय में प्रोफेसर भी रहे हैं.
रुद्रान्ग्शु मुखर्जी ने मंगल पांडेय के लिए बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में ' संयोग से बने नायक ' का प्रयोग किया है.
क्यों किया है इसे इतिहासकार किम ए वैगनर की पुस्तक 'द ग्रेट फियर ऑफ 1857 - रयूमर्स, कॉन्सपिरेसीज़ एंड मेकिंग ऑफ द इंडियन अपराइज़िंग' और इतिहासकार रोज़ी लिलवेलन जोन्स की पुस्तक "द ग्रेट अपराइजिंग इन इंडिया, 1857 - 58 अनटोल्ड स्टोरीज, इंडियन एंड ब्रिटिश " के हवाले से समझा जा सकता है.
इन क़िताबों में 29 मार्च 1857 को मंगल पांडेय के साथ घटित घटना का सिलसिलेवार ढंग से विवरण दिया गया है जिसकी पुष्टि भारतीय इतिहासकार रुद्रान्ग्शु मुखर्जी भी करते हैं.
मैं बिल्कुल सरल शब्दों में आपको बताता हूं कि उस दिन क्या हुआ था.
29 मार्च के कुछ महीने पहले ही भारतीय सिपाहियों के बीच यह अफवाह फैल चुकी थी कि अंग्रेज सभी भारतीय सिपाहियों को ईसाई बनाना चाहते हैं. यह भी अफवाह थी कि बड़ी संख्या में यूरोपीय सैनिक भारतीय सैनिकों को मारने आ रहे हैं.
29 मार्च तक जब यह खबर बंगाल में स्थित बैरकपुर छावनी में फैल गयी तब मेजर जनरल जेबी हिअरसी ने सैनिकों के बीच जाकर उन्हें यह समझाया कि यह सिर्फ झूठी अफवाह है. इस पर यकीन न करें.
लेकिन मेजर की इस अपील का उल्टा असर हुआ. सिपाहियों को लगा कि जब मेजर को यह बात पता है तो निश्चय ही इसमें सच्चाई होगी. लिहाज़ा स्थिति सम्हलने की बजाय और बिगड़ गयी. उन्हीं सिपाहियों में मंगल पांडेय भी थे जो यह सब सुनकर आतंकित हो गए.
सिपाहियों के बीच लगातार होती इन चर्चाओं से घबराए मंगल पांडेय उस वक्त आपे से बाहर हो गए जब वो भांग के नशे में धुत थे. बेचैनी और भांग के नशे ने मंगल पांडेय को जकड़ लिया. लिहाज़ा वो अपना मानसिक संतुलन खो बैठे और शाम को करीब 4 बजे क्वाटर गार्ड ( बिल्डिंग ) के पास सैनिकों को यह कह कर भड़काने लगे कि यूरोपीय सैनिक हमें मार डालेंगे. सार्जेन्ट मेजर जेम्स ह्वीसन ने जब यह शोर सुना तो वह पैदल ही मंगल पांडेय की ओर बढ़ने लगे. सार्जेंट को आता देख मंगल पांडेय को कुछ न सुझा तो उसने उन पर गोली चला दी. लेकिन यह गोली सार्जेंट को नहीं लगी.
यह खबर जैसे ही वहां उपस्थित अडज्यूटेंट लेफ्टिनेंट बेंपदे को मिली वह भी फौरन घटनास्थल की ओर चल पड़े. एक और व्यक्ति को करीब आते देख मंगल पांडेय ने घबराहट और बेचैनी में उन पर भी गोली चला दी. लेकिन इस बार भी मंगल पांडेय द्वारा चलाई गयी गोली सही निशाने पर नहीं लगी और उन्होंने तलवार से बेंपदे पर हमला किया. इतने में एक हिंदुस्तानी सैनिक हवलदार पलटू ने मंगल पांडेय को पीछे से पकड़ लिया. मंगल पांडेय ने उस पर भी हमला कर दिया और वहां से भाग निकले. भागते समय पलटू ने जमादार ईश्वरी पांडेय से अपील की वह मंगल को पकड़ने में मदत करे लेकिन सशंकित ईश्वरी पांडेय ने पलटू पर बंदूक तान दी और मंगल को जाने दिया.
वहां से भागते हुए नशे में चूर मंगल पांडेय ने अपने साथी सिपाहियों को गाली देते हुए कहा कि , "तुम लोगों ने मुझे भड़का दिया और अब तुम ********* मेरे साथ नहीं हो".
इसके फौरन बाद ही घुड़सवार और कई पैदल सैनिक मंगल पांडेय की ओर बढ़ने लगे और उन्हें घेर लिया. मंगल पांडेय को एहसास हो गया कि उनकी मृत्यु अब तय है क्योंकि उनके पास भागने का कोई रास्ता नहीं बचा था.
अंततः उन्होंने बंदूक की नाल को अपने सीने में लगाया, पैर के अंगूठे से ट्रिगर दबाया. गोली से उनकी जैकेट और कपड़े जलने लगे और वह घायल होकर जमीन पर गिर पड़े. उन्हें बंदी बना लिया गया. 6 अप्रैल को उनका ट्रायल हुआ और 8 अप्रैल को फांसी दे दी गयी.
गौर करने लायक है कि उक्त तीनों इतिहासकार इस बात की पुष्टि करते हैं कि मंगल पांडेय भंगेड़ी थे और उन्होंने भांग के नशे में मानसिक संतुलन खोकर अंग्रेज अधिकारी पर हमला किया. इतिहासकार रुद्रान्ग्शु मुखर्जी के अनुसार , यह नशे में चूर होकर की गयी मूर्खतापूर्ण हरकत थी. यही वजह है कि अपने कोर्ट मार्शल के दौरान जब मंगल पांडेय से उनकी हरकत के बारे में सवाल किया गया तो वह कोई जवाब नहीं दे पाए. मंगल पांडेय को स्वयं इस बात का एहसास नहीं था कि उन्होंने वह हरकत क्यों की.
यह भी बिल्कुल स्पष्ट था कि मंगल पांडेय के पास कोई दृष्टि या दूरगामी उद्देश्य नहीं था. 29 मार्च को जो भी हुआ वह मात्र भांग के नशे में हुई गलती थी. इसीलिए इतिहासकार रुद्रान्ग्शु स्पष्ट शब्दों में मंगल पांडेय को संयोगवश बना नायक कहते हैं.
इतना ही नहीं वह इस बात का भी खंडन करते हैं कि 1857 के विद्रोह में मंगल पांडेय का कोई योगदान था. असल में मंगल पांडेय के होने का न होने से विद्रोह को कोई फर्क नहीं पड़ता. वह तभी शुरू होता जब उसे होना था. मंगल पांडेय को 1857 के विद्रोह से जोड़ना राष्ट्रवादी इतिहासकारों द्वारा बढ़ा चढ़ाकर कही गयी बात है. इतिहासकार रुद्रान्ग्शु के अनुसार ऐसा इसलिए है क्योंकि 8 मई को पहला सैनिक विद्रोह उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुआ. बंगाल में स्थित बैरकपुर जहां मंगल पांडेय थे वहां से मेरठ की दूरी करीब डेढ़ हज़ार किलोमीटर ( 1526 ) है. अतः बैरकपुर में हुई घटना का प्रभाव सुदूर मेरठ में पड़ना मूर्खतापूर्ण और हास्यास्पद है. 1857 के विद्रोह पर मंगल पांडेय का प्रभाव वही था जो हाथी के शरीर पर उड़ते तिनके का होता है.
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि मंगल पांडेय न वीर थे , न देशभक्त थे , न शहीद थे और न ही उनका 1857 की क्रांति पर कोई प्रभाव था. वो एक भंगेड़ी थे जो अपनी अनजाने में की गयी गलती के कारण आज जातिवादी और उत्कट राष्ट्रवादी इतिहासकारों की वजह से बतौर नायक स्थापित हो चुके हैं. उन्हें नायक के रूप में ढोना न सिर्फ इतिहास बल्कि 1857 के विद्रोह में सचेत प्राण देने वाले नायकों के साथ भी भद्दा मज़ाक है.
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