हिंदुस्तानी आर्मी इतिहास की सबसे महान गौरवगाथा

हिंदुस्तानी आर्मी इतिहास की सबसे महान गौरवगाथा.

#The_art_of_war6:- 1962 के युद्ध में कैसे 120 लोगों की पल्टन ने अपनी जान देकर लद्दाख को हज़ारों चीनी फौजियों से बचाया, और क्यों इसे विश्व के टॉप battles में माना जाता है.

चूंकि अमरीका क्यूबा मिसाइल क्राइसिस में फंसा हुआ था, इसलिए चीन ने सही मौका देखकर  भारत पर हमला कर दिया और भारत से काफी जमीन हड़प ली।
लेकिन वे लोग लद्दाख को नहीं कब्ज़ा पाए, उसका कारण था 120 भारतीय फौजी.

6000 लोगों की चीन आर्मी ने चुसुल घाटी पर हमला बोल दिया,
पहाड़ी ऐसी थी की भारतीय सेना वहाँ स्थित पल्टन की मदद तक नहीं कर सकती थी.
फौजियों के पास ऑप्शन था की वे पीछे हट सकते थे क्यूंकि मौत तय थी, दूसरी कई पहाड़ियों पर पलटने ऐसे ही पीछे हट गयी थी। 5 किलोमीटर दूर बैठे ब्रिगेड हेडक्वार्टर ने उन्हें पीछे हटने को बोल भी दिया था.
लेकिन यहां पर मेजर शैतान सिंह ने अपनी टीम से बात की और फैसला ये हुआ की पहाड़ी नहीं छोड़ी जायेगी, क्यूंकि छोड़ते ही लद्दाख हिंदुस्तान के हाथ से निकल जाएगा.
कारण ये था की क्यूबा मिसाइल क्राइसिस ख़त्म होते ही अमरीका मदद के लिए आ जाना था, इसलिए चीन तबतक जितनी जमीन कब्ज़ा लेता उतनी उनकी हो जानी थी.

फौजियों ने फैसला किया की आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी जायेगी, और हुआ भी यही 120 में से 114 शहीद हो गए थे.

चार्ली कंपनी ने 120 लोगों को 3 पल्टन(7, 8, 9 नाम से) में बांटा गया 40 40 की, 1 1 किलोमीटर की दूरी पर थी तीनो पलटने.

सुबह साढ़े 3 बजे 10 चीनी फौजी रेकी करने के लिए पहाड़ी के नज़दीक आये तो नाइक हुकम सिंह ने उन्हें LMG से मार गिराया, युद्ध शुरू हो चुका था,
चीन के 400 फौजियों ने हैवी आर्टिलरी फायर किया 7 पल्टन पर, हुकम सिंह ने LMG फायर में उन 400 में से 250 लोगों को मार गिराया.
चीनी फौजी इस रेटालिएशन से घबरा के पीछे हो लिए.

लेकिन चीनी किसी भी हालत में हार मानने  वाले  नहीं थे, क्यूंकि लद्दाख कब्जाते ही एयरपोर्ट की जगह उनके हाथ आ जानी थी, जो बहुत बड़ी स्ट्रेटेजिक जीत होती चीन की।
चीनी फौजी भी पूरी तरह से मोटिवेटेड थे.

चीन को समझ में आ गया की युद्ध इतना आसान नहीं रहेगा जितना अब तक बाकी जगहों पर रहा है, ये जमीन कब्ज़ाने के लिए सब कुछ दांव पर लगाना होगा, इसलिए उन्होंने फौजियों को पीछे करके मोर्टार से हमला करने की प्लानिंग की.
चीनियों ने मोर्टार से हमला शुरू कर दिया और 8 पलटन में बंकर को उड़ा दिया. मेजर शैतान सिंह 8 पल्टन को लीड कर रहे थे, उन्होंने बंकर पहला हमला होते ही खाली करवा दिया इसलिए कोई भारतीय फौजी इस अटैक में नहीं मरा.

दूसरा अटैक हुआ 8 पल्टन पर, और इसबार निहाल सिंह ने 150 चीनी मार गिराए.

अब चीनियों को समझ आ गया की एक एक पल्टन पर हमले की बजाय घेरकर सभी पे इकठ्ठा हमला करना पड़ेगा क्यूंकि भारतीयों के पास हथियार भी कम थे और फौजी भी, इकट्ठे अटैक में जवाब मिलने की सम्भावना लिमिटेड हो जाती है.
लेकिन ऐसा करने से पहले वो भारतीयों का ध्यान भटकाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने पहले 7 पल्टन पर हमला किया,
ये चीनियों का इंटेलीजेंट और बेवकूफाना दोनों कदम माना जा सकता है,
इंटेलीजेंट इसलिए क्यूंकि इस से अगले हमले की जमीन तैयार हुई,
बेवकूफाना इसलिए क्यूंकि इसमें रामचंदर ने 400 चीनी फौजी ढेर कर दिए.

अब चीनियों ने 7 पल्टन पर अटैक के ख़त्म होने से पहले ही तीनो पलटनों पर इकट्ठे हमला कर दिया,
लोग कम थे इसलिए अब सभी पलटने कई और हमले में व्यस्त हो गयी,
इसी वजह से 7 पल्टन के हुकुम सिंह को गोली लग गयी और वो शहीद हो गए,
9 पल्टन के निहाल सिंह के दोनों हाथों में गोलियां लग गयी थी, लेकिन उन्होंने LMG से हटने से पहले उसे dissemble कर दिया ताकि कब्ज़ा करने पर चीनी उसे इस्तेमाल ना कर सके.

साढ़े 6 बजे मेजर शैतान सिंह को कंधे में गोली लग गयी.
जिसपर कपड़ा बांधकर शैतान सिंह फिर फायरिंग करने लग गए.

इसके बाद चीनी बंकर में घुस गए, और यहां से शुरू हो गयी ऐसी वीरता की कहानी जो इस से पहले या बाद में कभी ना सुनी गयी हो.
बंकर में घुसे चीनियों पर bayonet से हमले का कोई असर नहीं हो रहा था उनके सुरक्ष कवचों की वजह से। इसलिए लड़ाई अब हाथों से होनी थी.
भारतीय सेना का एक जवान था संग्राम सिंह, वो माना हुआ पहलवान था,
संग्राम सिंह ने अकेले हाथों से 40 चीनी फौजियों को मार गिराया, किसी की आँखें निकाल दी गयी, किसी की गर्दन तोड़ दी गयी.
संग्राम सिंह 6 फुट का भारी शरीर वाला आदमी था, बंकर में घुसे चीनियों को बाकी फौजी बन्दूक की उलटी तरफ से मारने लग रहे थे.
संग्राम सिंह ने कई चीनियों को उठाकर उनका सर चट्टानों पर दे मारा था.

उधर 8 पल्टन पर मेजर शैतान सिंह की हालत खराब हो चली थी, रामचंदर उन्हें उठाकर पहाड़ी से नीचे उतरने लगे, लेकिन कुछ कदम उतरने पर ही रामचंदर को एहसास हो गया था की मेजर अब नहीं रहे हैं. ये सवा 8 की बात थी.

रामचंदर जब नीचे आर्मी हेडक्वार्टर पर पहुंचा तो उसने सभी को बताया की उनकी 120 की टीम ने हज़ारों चीनियों को मार गिराया है,
किसी को उनपर विश्वास नहीं हुआ. रामचंदर पर इन्क्वायरी बिठाई गयी दिल्ली में, वहाँ भी किसी को उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ, सभी को लग रहा था की झूठ बोल रहा है, क्यूंकि पूरे देश में कहीं भी चीनियों को नहीं रोका जा पाया था, और 120 लोग हज़ारों को रोक लेंगे ये नामुमकिन लग रहा था.

चीनियों ने अपने फौजियों की लाशें अगले ही दिन उठा ली थी, लेकिन 20 नवंबर को ceasefire होने के बावजूद भारतीय टीम फ़रवरी में रेज़ांगला पहुंची थी.
वहाँ पहुंचे सभी लोगों की आँखों में आंसू थे, ब्रिगेडियर टी इस रैना की भी, जिन्होंने रामचंदर को धमकाया था की झूठ मत बोलो.
हर फौजी की छाती में गोली लगी हुई थी, हर फौजी ने 10 गुना चीनी फौजी मार रखे थे.

इस युद्ध की तुलना 300 स्पार्टन के युद्ध से की जाती है.
मेजर शैतान सिंह को इस बहादुरी के लिए परमवीर चक्र मिला.
चीनियों की वो कमर टूटी इस युद्ध से की ऊंची पहाड़ी पर पहुँचने के बावजूद इतनी casualties की वजह से उन्हें रेज़ांगला भी छोड़ना पड़ा, लदाख बच गया था.
और चूंकि इन 120 लोगों में से 114 अहीर जाती के थे, इसलिए रेज़ांगला में  आर्मी ने "अहीर धाम" नाम से इनका स्मारक भी बना रखा है.

हिंदुस्तानी आर्मी के इतिहास की ये सबसे महान गौरव गाथा है.

- Krishan Yadav की फेसबुक वॉल से साभार

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