वीपी सिंह : मंडल मसीहा के विविध पहलू
इलाहाबाद विवि के एक पूर्व छात्रसंघ उपाध्यक्ष से वीपी सिंह के बारे में बात हो रही थी. चूंकि दोनों ही विश्वविद्यालय यूनियन के पदाधिकारियों की सूची में बतौर उपाध्यक्ष दर्ज थे इसलिए बात करना लाज़मी था.
बात ये थी कि वीपी सिंह को किस तरह से याद किया जा सकता है ? इलाहाबादी के तौर पर , इलाहाबाद विवि के उपाध्यक्ष के तौर पर , प्रधानमंत्री के तौर पर या मंडल मसीहा और मूल्ययुक्त तथा साफ-सुथरी राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञ के तौर पर.
इस बातचीत में यही बात सामने निकल कर आयी कि उनका मूल्यांकन आप उक्त किसी भी मापदंड पर कर लें वो सभी पर खरे उतरेंगे.
बतौर इलाहाबादी देखें तो उनका जुड़ाव हमेशा इलाहाबाद से रहा. वह इलाहाबादी स्वभाव के अनुरूप ज़मीन से जुड़े नेता रहे और उन्होंने हमेशा ज़मीनी राजनीति को वरीयता दी. इतना ही नहीं , चूंकि उनके दौर में इलाहाबाद साहित्य और कला का केंद्र था. इसीलिए वह राजनीतिज्ञ होने के साथ ही साथ एक बेहतरीन कवि , लेखक , चित्रकार और फोटोग्राफर भी रहे. वास्तव में इलाहाबाद की मिट्टी ही ऐसी है कि आप उसे अपनाते हैं तो बदले में वह अपना सर्वस्व देती है. एक इलाहाबादी से बेहतर इस बात को कोई और नहीं समझ सकता.
इलाहाबाद विवि के उपाध्यक्ष के तौर पर देखें तो अभी तक उनके जैसे पदाधिकारी यूनियन को बिरले ही मिल सके हैं. इस बात के प्रमाण में सिर्फ एक उदाहरण ही पर्याप्त है. वीपी सिंह प्रधानमंत्री बनने के बाद भी हमेशा छात्रों और छात्रनेताओं से घिरे रहते थे. उनका नाता हमेशा ही छात्रों से और विवि से बना रहा. वो भी एक दौर था जब अमिताभ बच्चन के इस्तीफा देने के बाद उपचुनाव में वह छात्रों के साथ भरी दुपहरी में महंगी गाड़ियों की बजाय बाइक से घूम घूम कर चुनाव प्रचार करते थे. वह दौर गुज़र चुका है लेकिन उनके बाद भारत में ऐसा कोई भी प्रधानमंत्री नहीं हुआ जो इस तरह से सड़क पर उतरा हो.
देश के प्रधानमंत्री के बतौर वीपी सिंह वो शख्शियत थे जिनकी छवि देश के सबसे ईमानदार नेता के रूप में थी. उन्होंने 7 अगस्त , 1990 को मंडल कमीशन की शिफारिशें लागू करने की घोषणा के साथ न सिर्फ देश में चले आ रहे सामाजिक भ्रष्टाचार के उन्मूलन की नीव रखी बल्कि उस दौर की भ्रष्ट राजनीति का गंदा चेहरा भी उजागर करने का काम किया. उनके कार्यकाल में पूंजीपति और धनपशु कभी भी सर नहीं उठा सके. वीपी सिंह का खौफ इतना था कि वो उनके आसपास भी फटकने की हिमाकत नहीं कर पाते थे.
व्यक्तिगत तौर वीपी सिंह बेहद विनम्र और अपने मूल्य तथा आदर्शो पर अडिग रहने वाले व्यक्ति थे. राजपरिवार से होने के बावजूद भी वह अपने से छोटे और बड़े सभी से आप संबोधन के साथ बात करते थे. दानी स्वभाव ऐसा था कि अपनी युवावस्था में ही उन्होंने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़कर अपनी रियासत की बहुत सी ज़मीने दान कर दी थी. उन्होंने देहरादून में अपनी करोड़ों-अरबों की जमीन उन लोगों के लिए यूँ ही छोड़ दी थी जो नाममात्र का किराया देकर वहां दुकानें आदि चलाते थे.
वीपी सिंह की एक और उपलब्धि है जो भारत के किसी नेता को हासिल नहीं हुई है. वो सवर्ण पृष्ठभूमि से आने वाले ऐसे पहले नेता हैं जो सवर्णो द्वारा सबसे ज्यादा गरियाये गए हैं. मौजूदा समय में गाली खाने वाले जवाहरलाल नेहरू भी इस मामले में उनसे बहुत पीछे हैं.
वीपी सिंह में भी हर नेता की तरह खूबियां और खामियां दोनों ही थीं. ऊपर लिखीं बातों में मैंने उनके जीवन के सकारात्मक पहलुओं का जिक्र किया है. इन सब बातों को दरकिनार कर दिया जाए तब भी वीपी सिंह सिर्फ एक बात के लिए भारतीय राजनीति के इतिहास में बतौर नायक याद किये जाते रहेंगे.
वो है - मंडल कमीशन की शिफारिशों को लागू करवाना.
उनके इस एक निर्णय ने भारतीय समाज और राजनीति की पूरी दशा व दिशा ही बदल दी. हम आज भी उन बदलावों से गुजर रहे हैं. आगे भी गुजरते रहेंगे. तब तक , जब तक की सामाजिक न्याय की लड़ाई अपने मुकाम तक नहीं पहुंच जाती.
वीपी सिंह को सादर नमन !
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