पुरुष सौन्दर्यशात्र की पराधीनता

क्या स्त्री जिसे सुंदर होना और कुरूप होना मानती है ,  वह उनके द्वारा तय किया हुआ है ?

नहीं. असल में पुरुषों ने गज़ब का सौंदर्यशास्त्र रचा है.  स्त्रीयां गुलाम हैं उनके बनाए मापदंडो की.

पुरुषो को स्त्री के बाल अच्छे लगे तो बिना सोचे समझे लग गयी बाल संवारने में. बालों को रंग दिए , विविध आकार दिए और उन सभी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल किया जो पुरुषों द्वारा संचालित मार्किट में बालों की सुंदरता के लिए जरूरी बताया गया. बाल , बाल न होकर भले ही जी का जंजाल हो लेकिन उनके रंग और आकार-प्रकार को खूबसूरती का मापदंड मान लिया और आंख मूंद कर संवारने में लग गयी. इसी चक्कर में हजारो फूंक दिए बालो की खूबसूरती के लिए.

गोरी रंगत अच्छी लगी तो लग गयी क्रीम-पाउडर से मुह चमकाने में. मार्केट के ईजाद किये हुए सारे प्रोडक्ट्स पोत लिए मुंह पर. घंटो बर्बाद कर दिए ब्यूटी पार्लर के चक्कर काटने में. बिना ये सोचे कि वो कितने जरूरी हैं , उनके फायदे और नुकसान क्या हैं. बिना ये परवाह किये कि कितने समय और पैसे की बर्बादी हुई.

 
लम्बी नहीं है तो चार इंच की सैंडल डाल ली पैरो में.  तकलीफ सहना शुरू कर दिया अपने बढ़ाये हर कदम पर. टांगो को जूते-चप्पल और सैंडल का गुलाम बना दिया. जैसे उनकी सार्थकता पैरों में नहीं बल्कि पैरों की सार्थकता जूते-चप्पलों में हों.

पतली अच्छी लगी तो खुद को भूखे रख कर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. कमजोरी और बीमारियाँ मोल ली खुद के लिए. कुपोषित होकर गौरवान्वित होने लगीं.

होंठ अच्छे लगे तो उन्हें रंग डाला तमाम रंगों से. लाल , गुलाबी , कत्थई यहां तक कि हरे पीले हर रंग से. वो तमाम प्रोडक्ट्स मल लिए जिनसे होंठ तय खूबसूरती के मापदंड में फिट बैठ सकें.

आंखें अच्छी लगीं तो पलक से लेकर आईब्रो तक की ऐसी तैसी कर दीं. आंख और उसके आसपास की जगह को प्रोडक्ट आजमाइश का अड्डा बना दिया. काजल , मस्करा , आईलाइनर , आईशैडो और वो तमाम उपाय अपना डाले जिनसे आंखें खूबसूरत दिख सके.

शरीर बिना बालों का अच्छा लगा तो नख-शिख तक बालों के खिलाफ जंग छेड़ दीं. वेक्स , लेज़र ट्रीटमेंट , मैनीक्योर , पैडीक्योर आदि वो सब तरीके अपना डाले जिससे शरीर बाल रहित हो सके.

सुगंधित शरीर अच्छा लगा तो कृत्रिम गंध से भर गयी. इतना भर गयी कि अपने ही शरीर की गंध याद नहीं रही. चारो तरफ महकती रहीं और इतना महकी कि अपने शरीर की गंध , दुर्गन्ध महसूस होने लगी.

पर्दे में रहना अच्छा लगा तो लपेट ली लज्जा की चादर. बन गयी छुई मुई . खो दी अपनी आजादी. खो दिया अपना अस्तित्व.

बदन उघाड़ते हुए अच्छी लगीं तो दिसंबर की ठंड में भी चिथड़ेनुमा कपड़े लपेट लिए. भले ही ठंडी में ठिठुर कर जान जाती रहे.

औरतें बस बिना जाने , बिना समझे , उलझी पड़ी है पुरुषो के बनाये मायाजाल में. उनके अधिपत्य वाली मार्किट की गुलामी में. कोई कुंठित है , किसी को घमंड है तो कोई ग्लानि से भरा हुआ है. 
कब तक चलेगा ऐसा ?
कब मुक्ति मिलेगी इन आडम्बरो से ?
कब पुरुषों के बनाये सौन्दर्य और कुरूपता के भ्रम से निकलेंगी स्त्रीयां ? 
कब होगी उनकी देह-मुक्ति ?

Comments

Popular posts from this blog

गोरखनाथ की जाति

कैवर्त/केवट विद्रोह

28 अगस्त , राजेन्द्र यादव की स्मृति में..