स्वाधीनता संग्राम और दलित , पिछड़े , आदिवासी
अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि आज अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग में शामिल जातियाँ, जो कि बहुसंख्यक हैं , स्वाधीनता संग्राम में बड़े पैमाने पर नज़र क्यों नहीं आती । उस दौर में आखिर वो क्या कर रही थीं ? आज़ादी की लड़ाई के कुलीन नेतृत्व और मुख्यधारा में उनकी भागीदारी क्यों नहीं दिखती है ?
इसका पहला कारण तो ये है कि इन वर्गों से आने वाले ऐसे बहुत से नेता थे जिनको इतिहास में जगह नहीं दी गयी । उनकी जमीन पर लड़ी गयी लड़ाई , कुलीन नेतृत्व की आड़ में दब गयी और उनके बलिदान और संघर्ष का श्रेय बड़े नेताओं को मिला ।
स्वाधीनता संग्राम में निम्न जातियों से आने वाले ऐसे सैकड़ो रिकॉर्डेड फांसी प्राप्त , अंग्रेजो द्वारा आजीवन कारावास पाए और उनकी गोली का शिकार हुए लोग हैं जिनका नाम आज भुला दिया गया है और जिनके बलिदान का क्रेडिट चर्चित नेताओं को मिला है ।
हमारा इतिहास मकड़ी के बुने जाले की तरह है जिसमें जाले तत्कालीन घटनाएं और मकड़ी उस दौर के बड़े व्यक्तित्व हैं । अफसोस की बात है कि तथ्यों के अभाव में इतिहास को आज सीधा और साफ करके देख पाना मुश्किल है । फिर भी हमारे भूले बिसरे नायकों की खोज और खोजे हुए नायकों का उभार जारी है ।
इसका दूसरा कारण है , निम्न जातियों का ऊंची जाति के लोगों द्वारा शोषण और इससे जनित संघर्ष । स्वाधीनता संग्राम के दौर में निम्न जातियाँ अपने लोगों द्वारा ही शोषण, संघर्ष और दमन के दुष्चक्र में ही फंसी रहीं ।
अब तक के इतिहास में प्रायः यही देखने को मिलता है कि निम्न जातियों पर अंग्रेजी शासन की तुलना में सबसे अधिक जुल्म समाज की ऊंची जातियों ने किया है ।
अंग्रेजी शासन का जुल्म परोक्ष था , प्रत्यक्ष नहीं ।
इसलिए निम्न जातियाँ अंग्रेजो से संघर्ष करने की बजाय प्राचीनकाल से शोषण करती आ रही ऊंची जातियों से संघर्षरत थीं ।
उनके प्राथमिक शोषक और शत्रु ऊंची जाति के भारतीय थे न की अंग्रेज । इसलिए यह लाज़मी था कि वो पहले उन ऊंची जाति के भारतीयों से लड़े जो अंग्रेजो के भारत आने के हज़ारो साल पहले से उनका शोषण कर रहे थे ।
इस धारणा के संदर्भ में सिर्फ एक उदाहरण ही काफी है । यह उदाहरण ज्ञानेंद्र पांडेय और शाहिद अमीन की सबाल्टर्न स्टडी नामक किताब में अवध विद्रोह के अंतर्गत एक घटना के रूप में मिलता है ।
घटना ये है कि फैज़ाबाद में 6 और 7 जनवरी 1921 को किसानों और खेतिहर मज़दूरों का विद्रोह हुआ । विद्रोह का मुख्य कारण सूदखोरी और किसानों की ज़मीन से बेदखली थी ।
विद्रोह करने वालों में अहीर , भर , लुनिया और अछूत समझे जाने वाले पासी और चमार जातियों के लोग थे । अकबरपुर और टांडा में भी पासी , चमार , लुनिया तथा दूसरी मजूर जातियों के लोग अग्रणी थे । इन्होंने विद्रोह में ऊंची जाति के लोगों पर हमला किया और उन्हें लूट लिया ।
इस हमले में निम्न जाति की महिलाएं भी शामिल थी । उन्होंने ऊंची जाति की महिलाओं पर अपना आक्रोश निकाला ।
इसके अलावा इस हमले का मुख्य निशाना बड़ी जाति के बनिये बने जिन्होंने किसानों की कठिन परिस्थितियों का फायदा उठाकर भारी मुनाफा कमाया था । ऊंची जाति के तालुकेदार भी उनका निशाना बने और उनके घर , कपड़ो , गहनों तथा अन्य सामान को जला दिया गया ।
सूदखोरी करने वाले कुछ सुनार और ज़मीन के नाम पर उगाही करने वाले पटवारी भी उनके हमलों का शिकार बने ।
इसके विरोध में फैज़ाबाद में ऊंची जाति के लोग , खुलकर इस विद्रोह के खिलाफ खड़े हो गए । उन्होंने अंग्रेजी पुलिस के गांवों में आने का स्वागत किया और उनके साथ मिलकर विद्रोह का दमन किया ।
इस घटना से तीन बातें स्पष्ट होती हैं -
1. ऊंची जाति के लोग निम्न जाति के लोगों का भयानक शोषण करते थे । इसीलिए निम्न जाति के लोग अंग्रेजो की बजाय इनके खिलाफ विद्रोह करते थे । उनके असल दुश्मन अंग्रेज नहीं , ऊंची जाति के विभिन्न शोषक थे ।
2. अंग्रेजी पुलिस ऊंची जाति के शोषकों की सहायक थी । वह विद्रोह और संकट की स्थिति में शोषकों की सहायता करती थी , शोषितों की नहीं ।
3. निम्न जातियों का अंग्रेजों और ऊंची जाति के शोषकों के कारण दोहरा शोषण होता था । उन्हें काले और गोरे , दोनों ही अंग्रेजो से लड़ना पड़ता था ।
इसीलिए , उनका जीवन ऊंची जाति के शोषकों का अत्याचार सहने या प्रतिरोध करने में ही बीत जाता था ।
कुलीन और ऊंची जाति के नेता व इन जातियों के आम लोगो के सामने इस तरह का दोहरा संकट नहीं था । उनके शत्रु मात्र अंग्रेज थे क्योंकि वह उनके अधिकार और वर्चस्व को चुनौती दे रहे थे ।
अतः उक्त दो मुख्य कारणों से स्पष्ट है कि आज एससी , एसटी और ओबीसी में शामिल जातियां स्वाधीनता संग्राम में कम नज़र क्यों आती हैं ।
इसके पीछे हमारे समाज और इतिहास की दृष्टि व कर्म का दोष है न कि इन वर्गों की जातियों का ।
आज समाज के कुलीन वर्ग और ऊंची जातियों के हाथ में सत्ता का हस्तांतरण होने से उनका शोषण खत्म हो चुका है । उन्हें आज़ादी मिल चुकी है ।
लेकिन निम्न जातियों का शोषण अभी खत्म नहीं हुआ है । उनके स्वाधीनता की लड़ाई आज भी जारी है ।
इसलिए इस पर प्रश्नचिन्ह लगाना बंद करिये कि वे देश के दुश्मनों के खिलाफ लड़े या नहीं लड़े । असल में , वे तब भी लड़ रहे थे और वे आज भी लड़ रहे हैं ।
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