कैवर्त/केवट विद्रोह
सामंतवाद के रूप में ब्राह्मण-क्षत्रिय राजनीतिक गठजोड़ का परिणाम किसानों की दुर्दशा के रूप में सामने आया । ऐसी स्थिति में उनके पास दो रास्ते बचे -
पहला , वो गांव छोड़ दें । ऐसे गांव का उल्लेख ' सुभाषितरत्न-कोष ' में मिलता है जहां लोगो ने सामंत के अत्याचारों से तंग आकर गांव छोड़ दिया था । गांव में सिर्फ गिरी ढही दीवारें ही शेष रह गयी थीं । हर्षचरित और बृहन्नारदीय पुराण में भी ऐसे गांवो का जिक्र है ।
दूसरा , वो अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का विरोध करने के लिए सामंतों से संघर्ष करें ।
पूर्वी बंगाल के कैवर्तों ने दूसरा रास्ता चुना जिसका जिक्र संध्याकर नंदी की रामचरित में मिलता है । इतिहासकार रामशरण शर्मा ने भारतीय सामन्तवाद नामक किताब में इसे उधृत किया है ।
कैवर्तों से खेती की जमीनें छीन ली गयी थीं । जिनके पास बची थी उन पर करों का बोझ इतना अधिक था कि वो कर चुकाने में अक्षम थे । उनसे उनका पेशा छीन गया था और वह भुखमरी की कगार पर पहुंच चुके थे । इसका परिणाम विद्रोह के रूप में सामने आया । इस विद्रोह के नेता थे भीम और जिनके खिलाफ विद्रोह हुआ वो राजा थे रामपाल ।
कैवर्तों ने युद्ध के लिए तीर धनुष बनाये । वाहन के रूप में भैंसों का प्रयोग किया।
इस विद्रोह के वर्णन में बताया गया है कि कैवर्तों ने भैंसों पर चढ़कर तीर धनुष से युद्ध लड़ा । उनके तन पर कपड़े नहीं थे । वो नग्न होकर युद्ध लड़े । इसका कारण संभवतः उनकी निर्धनता थी कि उनके पास तन ढकने के लिए कपड़े नहीं थे । किंतु उनका आत्मसम्मान तन पर कपड़ो से अधिक अपनी ज़मीन और रोटी से जुड़ा था । उन्होंने नग्न रहकर ही लड़ाई लड़ी ।
जो पशु उनकी खेती में काम आते थे , जिनसे उनको दूध - दही आदि मिलता था वही उनके युद्ध में भी काम आए । वह पशु उनकी पूंजी और पारिवारिक सदस्य दोनों ही थे । यह शोषण की इंतहा ही रही होगी कि कैवर्तों को उन्हें भी युद्ध में झोंकना पड़ा ।
यह विद्रोह इतना जबरदस्त था और विद्रोही इतने जोशीले और जीवट थे कि इसे दबाने के लिए रामपाल की सेना विफल हो गयी । रामपाल को अपने अधीन अन्य सामंतों की मदत लेनी पड़ी । अंत में राजा और उसके सामंतों के मिलकर प्रयास करने के बाद ही विद्रोह का दमन हो सका ।
कैवर्त विद्रोह जैसी घटनाएं प्राचीन भारतीय इतिहास में बहुत कम देखने को मिलती है । संभवतः कैवर्त ऐसे पहले कृषक समूह थे जिन्होंने सामन्तवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी ।
कैवर्तों की यह लड़ाई आज भी जारी है । उनके सामने ब्राह्मणवाद और सामन्तवाद नए कलेवर में उनका दमन करने लिए खड़ा है । गोरखपुर में उनकी जीत एक आधुनिक विद्रोह था जो अभी थमा नहीं है ।
यह आगे भी जारी रहेगा ।
Jay kaiwarth jindabad
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