बलात्कार

माँ कहती थी जब तू पैदा हुई तो बहुत दर्द हुआ था
जब तू पहली बार लड़खड़ा कर गिरी तो
मेरी भी चीख निकल पड़ी थी
एक बार तेरे बापू रो पड़े थे
तुझे बुखार में तपता देख कर 
तेरा भाई कोने में सिसकता था
मैं सबके साथ दहाड़ मार के रोई थी
और तू बेसुध पड़ी थी मेरी गोद में

माँ ने मेरा हर दर्द करीब से देखा था
मां हर दर्द समझती थी मेरा
मां हर दर्द सहती थी मेरे लिए
लेकिन उस दिन मां नहीं थी
मैं मरी पड़ी थी कहीं
‎उससे पहले मुझे नहीं पता था
ऐसा भी कोई ‎दर्द होता है
माँ ने इस दर्द के बारे में कभी नहीं बताया
बताती भी क्यों
वो पड़ोस के गांव के किस्से सुनती थी
टीवी अखबार में खबरें देखती थी
नहीं जानती थी कि
बिटिया भी एक दिन सहेगी ये सब

माँ इस दर्द के बारे में सुनकर कितना चीखी होती ?
मां कितना रोई होती  ?
कैसे बताती मैं माँ को ?
उस दिन सबने मिलकर भोगा था मुझे
मेरी आत्मा और शरीर से अलग कर दिया था मुझे ,
मेरी हत्या करने से पहले ही
मार डाला था मुझे ?

शायद मेरी योनि उनके मां की योनि सी नहीं थी
जिससे वो पैदा हुए
जिसके स्तनों का दूध निचोड़कर वो बलशाली बने
शायद मेरी योनि उनकी बहनों की योनि सी नहीं थी
जिस पर वो पहरा देते थे
जिसकी रक्षा की कसमें खा कर और धागे बांधवाकर
अपने पुरुष होने का दम्भ भरा
शायद मेरी योनि उनकी बेटियों की योनि सी नहीं थी
जिन्हें प्यार दुलार से घर में कैदकर बड़ा किया
जिनको दान कर वह कृतार्थ पुरुष होने के
भाव से भरे रहे
शायद मेरी योनि उनकी बूढ़ी दादियों-नानियो की योनि सी भी नहीं थी
जिनसे उनके मां बाप जन्मे
और उन सभी को जन्म दिया

मुझे याद आता है
मरने से पहले मेरे सामने तैर रहीं थी स्मृतियां
बापू मेरे चूम लेते थे मेरा माथा
चाचा प्यार से गोद में बिठा कर जलेबियां खिलाते थे
भैया कंधे पर बिठाकर गांव घुमाते थे
दादा-नाना की गोद पालना थी बिल्कुल 
पेट में सर छुपा कर सो जाती थी
जीवन में जिन भी पुरूषों को जानती थी सब याद आये मुझे

वो उनसे अलग थे
उस दिन एक ने मेरे होठों को मुंह में भींच कर
रिसते खून का स्वाद चखा था
मैं उसके बेटी जैसी बनने की कोशिश करती रही
उसे उसकी बेटी को भी याद दिलाया
उसकी बेटी की दुहाई दी
लेकिन वो ऊपर चढ़ कर मेरे होठों के साथ उससे रिसता खून भी चूसता रहा
मेरी सांस रुक गयी थी
आह-चीख सब भीतर घुट गयी थी
इतना बोझ मैंने कभी महसूस नहीं किया अपने ऊपर
वो पैंट खोलकर लिंग रगड़ता रहा मेरी योनि पर
स्खलित होकर पसर गया ऊपर
मैं सन्न पड़ गयी थी
सब शून्य हो गया था
उसकी बेटी का फोन आने के बाद छूटी मैं
कहता था सब्जी लेने आया हूँ
तुम्हारे लिए कुछ लाना है ?
मैं चीखी थी कि आह पहुंच सके उसकी बेटी तक
यही दे आये आज वो अपनी बेटी को
लेकिन वो जा चुका था बाजार की ओर

फिर कुछ लड़के आये
शौर्य से भरे , चाकू जैसे लिंग वाले
बहनों की रक्षा करने वाले
योनि रक्षक
मुझे नहीं पता उनके लिंग का तनाव कैसे नियंत्रित होता था
उनकी बहनों की देह के इर्दगिर्द
जब वो बाजार , स्कूल , चौराहों तक उनके साथ जाते थे
वो मेरे आगे शौर्य से भरे थे
उनके चाकू सरीखे उन्नत लिंग मेरी योनि से रक्तधारा बहाने को तैयार थे
मैंने उनके सामने उनके बहनो जैसा बनने कि कोशिश की
उन्हें उनकी बहनों की याद भी दिलाई
उनकी बहनों की दुहाई दी
लेकिन वो नहीं माने
उन्होंने बेध डाला मुझे
खून से सना मांस का लोथड़ा बना दी मेरी योनि
मेरी शरीर और आत्मा को क्षत-विक्षत कर दिया
एक के बाद एक
तब भी नहीं छोड़ा जब मैं दर्द से अचेत हो गयी
मैंने महसूस किया पहली बार
जैसे शरीर को फाड़कर
बहुत गहरे कहीं हाथ डाल
मेरी छुपी हुई आत्मा खींच ली गयी हो
और उसे सूली पर टांग दिया गया हो
नग्न कहीं चौराहे पर
मैं उस दिन सिर्फ खून से सनी योनि बनकर रह गयी
मैं उनकी बहन और बेटी भी हो सकती थी
इतना नहीं तो सिर्फ लड़की हो सकती थी
या इंसान हो सकती थी 
मैंने सब नज़र आने की कोशिश की
सबकी दुहाई दी
लेकिन मैं खून से सनी योनि बनकर रह गयी उस दिन

रात में जब आंख खुली तो खुसुर फुसुर सुनी
मुझे मारने न मारने की चर्चा हो रही थी
मेरी लाश जलाने या गाड़ने पर विमर्श हो रहा था
मेरे टुकड़े करने या साबुत नदी में फेंकने पर बहस चल रही थी
इससे पहले की वो मारे मुझे
मैं मर चुकी थी
मेरे लिए कुछ नहीं बचा था दुनिया में
मैंने मन ही मन खुद का गला घोंट दिया
मार डाला खुद को

मुझे याद नहीं उसके बाद मुझे मारा गया या छोड़ दिया गया
मेरी लाश को जलाया गया या ज़मीन में दफन किया गया
मेरे टुकड़े हुए या साबुत ही नदी में फेंक दी गई
मुझे कुछ भी याद नहीं
बस इतना पता है कि मैं मर गयी
और उस दिन मेरे मरने के साथ ही
मानवता भी मर गयी
उस दिन मर गए सारे रिश्ते नाते
मर गयी दुनिया की शेष बची अच्छाई भी
जो नहीं मरी वो पुरुष की बलशाली सत्ता थी
जो सदियों से मानवता का बलात्कार कर
समाज का सर पैरों तले दबाए खड़ी थी
वो जिंदा थी और अट्टहास कर रही थी
मुझ पर ।
 

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