भारतीय सामन्तवाद : ब्राह्मण-क्षत्रिय गठजोड़ की पड़ताल
क्या आपको पता है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय राजनीतिक तौर पर करीब कब आये ? कब उनका सामाजिक गठजोड़ , राजनीतिक गठजोड़ में बदल गया ? इस गठजोड़ से जनित शोषणकारी व्यवस्था के विरोध में सबसे पहले आवाज़ किस दलित जाति ने उठायी ? कब ब्राह्मण धर्म , दलितों और आदिवासियों तक अपनी पहुंच बनाने लगा ?
कब सूर्यवंशी और चंद्रवंशी राजा अचानक से पैदा होने लगे ?
ये सभी घटनाएं एक ही घटना का परिणाम हैं जिसे इतिहास में सामंतवाद कहते हैं । भारतीय समाज में ब्राह्मणवाद के बाद वंचित जातियों के शोषण का यह दूसरा सबसे बड़ा कारक है जिस पर बहुत कम बात की जाती है ।
इतिहासकार रामशरण शर्मा , अपनी पुस्तक ' भारतीय सामंतवाद ' में उपरोक्त बातों से जुड़े कुछ तथ्य छोड़ गए हैं जिनको व्याख्यायित कर इस बारे में समझना आसान हो जाता हैं ।
1. सामंतवाद का उदभव और विकास पहली शताब्दी से जुड़ा है जिसमें ब्राह्मणों को भूमि अनुदान दिया जाने लगा । उत्तर भारत में तीसरी शताब्दी के बाद गुप्त काल के अंतर्गत यह अनुदान सर्वाधिक संख्या में दिए गए । दक्षिण भारत में यह आठवीं शताब्दी के बाद राष्ट्रकूटों के समय सर्वाधिक संख्या में दिए गए । राष्ट्रकूट राज्य के एक अनुदान पत्र में 1400 और दूसरे में 400 गांव दान दिए जाने का उल्लेख है ।
2. ब्राह्मणों को ये दान किसी इहलौकिक सेवा के लिए नहीं बल्कि धार्मिक कारणों से या अपना परलोक सुधारने के लिए दिए गए । कुछ कुछ वैसे ही जैसे यूरोप में चर्च को अनुदान दिए गए । फर्क सिर्फ इतना है कि चर्च एक संगठित संस्था थी जबकि ब्राह्मण एक जाति थी । सरल भाषा में कहूँ तो ब्राह्मणों को उनकी जाति के कारण मुफ्त में अकूत संपत्ति मिली । यह प्रक्रिया सामन्तवादी दौर के अन्य राजवंशो के समय में भी चलती रही ।
3. इससे ब्राह्मण और क्षत्रिय , पहली बार शासन के मध्यवर्ती और निचले स्तर पर करीब आये । उनमें मेलजोल बढ़ा और उन्होंने अपना संयुक्त वर्चस्व कायम करने के लिए राजनीतिक गठजोड़ की शुरुवात की । इससे पहले यह शासन के उच्च स्तर तक ही सीमित था ।
4. ब्राह्मणों ने अपने दाताओं की कृपा के बदले प्रतिदान के रूप में पूर्व मध्यकाल के राजाओं के लिए जाली वंशवृक्ष तैयार किये । उन्हें सूर्यवंशी अथवा चंद्रवंशी साबित कर के ये भ्रम फैलाया की वे अपने दैवीय अधिकार के बल पर शासन कर रहे हैं । आज ऐतिहासिक राजाओं के संदर्भ में मिलने वाला सूर्यवंश और चंद्रवंश फर्जी और ब्राह्मणों की कोरी कल्पना मात्र है ।
5. ब्राह्मणों को दिए गए भूमि अनुदान के कारण वर्ण व्यवस्था से बाहर की बहुत सी जनजातियां उनके सीधे संपर्क में आई । ब्राह्मणवादी व्यवस्था में शामिल करने के लिए उन्हें अलग अलग जातियों का नाम दिया गया । सामन्तवादी दौर में अनेक नई जातियों का उल्लेख मिलता है । इस तरह सामंतवाद ने ब्राह्मणवाद के विस्तार में अभूतपूर्व भूमिका निभाई ।
6. सामंतवाद के कारण भारत का अंदरूनी और बाहरी व्यापार चौपट हो गया और भारत एक कूपमंडूक देश बन गया । यह ब्राह्मण-क्षत्रिय राजनीतिक गठजोड़ द्वारा जनित स्थिति थी , जो उनके लिए बेहद अनुकूल थी ।
7. सामन्तवाद के कारण पहले के किसान पराधीन होते चले गए और उनकी हालात बेहद खराब हो गयी । इसने कृषक जातियों के अमानवीय शोषण को बढ़ावा दिया । इससे वो कृषक न रहकर बेगारी करने वाले मज़दूर या दास बन गए ।
8. सामन्तवादी शोषण के खिलाफ किसानों का सबसे पहला विद्रोह पूर्वी बंगाल में हुआ जिसका जिक्र संध्याकार नंदी की रामचरित में मिलता है । यह विद्रोह था - कैवर्त विद्रोह और इसके नेता थे भीम । कैवर्त विद्रोह यानी आज केवट मानी जाने वाली जातियों का विद्रोह ।
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