अम्बेडकर का आग़ाज़...

अम्बेडकर का आग़ाज़...

अम्बेडकर का भारतीय राजनीति में प्रवेश बहुजन समाज के लिए बेहद दिलचस्प और प्रेरणादायी है । यह उन सभी राजनीतिक दलों , संगठनों  और व्यक्तियों के लिए भी सबक है जो बहुजन राजनीति के पक्षधर हैं । 

यह किस्सा शुरू होता है ज्योतिबा के निधन के बाद । ज्योतिबा के निधन के बाद उनके द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज महाराष्ट्र का प्रमुख समाज सुधारक संगठन था । उसी दौर में 1906 में ऊंची जाति के विठ्ठल रामजी शिंदे ने ' डिप्रेस्ड क्लासेज मिशन ' की शुरुवात की जो धीरे धीरे महाराष्ट्र का सबसे शक्तिशाली समाज सुधारक संगठन बन गया । इसके संस्थापक शिंदे , अपने आप को अछूतों का सबसे बड़ा प्रतिनिधि मानते थे । इस संगठन का मूल उद्देश्य शिक्षा तथा हिंदूवादी विचारों का प्रचार-प्रसार करना था । संगठन के अध्यक्ष शिंदे की कोशिश थी कि अछूत ; हिंदूवादी राजनीतिक और सांस्कृतिक ढांचे के अंदर बने रहें । यही वजह है कि इस संगठन को प्रार्थना समाज के ब्राह्मण सुधारकों का पूरा समर्थन प्राप्त था । 

वही दूसरी ओर अम्बेडकर देख रहे थे कि किस तरह कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति शाहू जी , राज्य की सेवा में गैर ब्राह्मणों को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर समतामूलक समाज के निर्माण में महती भूमिका निभा रहे थे । इन्ही कारणों से उनकी साहू जी से नजदीकी बढ़ने लगी थी जिससे आगे चलकर वे उनके अच्छे मित्र बने । अम्बेडकर से व्यक्तिगत और वैचारिक जुड़ाव के कारण ही साहू जी ; 1920 के बाद अम्बेडकर द्वारा संपादित मूकनायक को चंदा भी देने लगे । इतना ही नहीं , उन्होंने 19 तथा 20 मार्च 1920 में मनगांव , कोल्हापुर में दो दिवसीय सम्मेलन में डॉ अम्बेडकर का अभिनंदन भी किया । 

विठ्ठल रामजी शिंदे को अम्बेडकर के इस उभार से समस्या थी । अम्बेडकर को भी शिंदे के अछूत उद्धार के रवैये और तौर-तरीकों से दिक्कत थी । अम्बेडकर और शिंदे के बीच की तकरार उस समय उभर कर सामने आई जब साउथ बौरो आयोग के समक्ष मताधिकार संबंधी साक्ष्य देने का मामला आया । इस आयोग का गठन मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के बाद किया गया था जो भारत में मताधिकार के बारे में लोगों का विचार जानने के लिए सर्वेक्षण हेतु आया था । 

अछूतों के मताधिकार के बारे में राय जानने के लिए इस आयोग ने किसी अछूत नेता को बुलाने की बजाय अछूतों पर काम करने वाले ऊंची जाति के नेता , शिंदे तथा चंदावरकर को बुलाया । शिंदे ने आयोग के समक्ष यह मत रखा कि अछूतों को मताधिकार दिया जाय लेकिन इसके साथ उनके चौथी पास होने की शर्त भी जोड़ी जाय । उस समय के भारत में , जब बहुसंख्य अछूत अशिक्षित थे , ऐसा प्रस्ताव उन्हें मताधिकार से वंचित रखने के समान था । 

अम्बेडकर ने शिंदे के प्रस्ताव को खारिज करते हुए यह ज्ञापन दिया कि बम्बई प्रेसिडेंसी के चयनित क्षेत्रों से 11 अछूतो का चुनाव किया जाय , जो आगे चलकर विधानसभा के लिए अपने एक प्रतिनिधि का चुनाव करेंगे । 

अम्बेडकर का यह ज्ञापन बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि शिंदे के प्रस्तावों पर अमल करने से एक भी अछूत जनप्रतिनिधि का विधानसभा में जाना संभव नहीं हो पाता । 

शिंदे इस ज्ञापन के पक्ष में नहीं थे । शिंदे की स्थापित समाज सुधारक की छवि के कारण अन्य लोगों को भी यह प्रस्ताव रास नहीं आ रहा था । लेकिन अम्बेडकर डटे रहे । उन्हें शिंदे के मंतव्यो के बारे में अच्छे से पता था । उन्होंने शिंदे पर सीधा प्रहार जारी रखा । नागपुर में आल इंडिया कांफ्रेंस ऑफ द बाइकाटेड के तीन दिवसीय सम्मेलन में शिंदे के खिलाफ अम्बेडकर ने संकल्प रखा कि ' शिंदे के प्रस्तावों से अछूत जातियाँ सदा ऊंची जातियों के वर्चस्व के अधीन बनी रहेंगी । इससे उनका भला कतई नहीं होने वाला है । '

अम्बेडकर ने आगे भी शिंदे के प्रस्ताव तथा उनके नेतृत्व के खिलाफ अभियान जारी रखा । इसमें शिंदे के निरंकुशतापूर्ण व्यवहार का विरोध करने वाले अछूत छात्र भी शामिल हुए । 

आगे चलकर अम्बेडकर की तार्किकता और उनके बढ़ते कद को देखकर शिंदे को झुकना पड़ा और उन्हें समझ आ गया कि अब उनका अछूतों के नेतृत्व पर दावा करना और उनके हितैषी के रूप में स्थापित समाज सुधारक बने रहना संभव नहीं है । 

अछूतों को अम्बेडकर के रूप में एक नया नेतृत्व नज़र आने लगा था । उन्हें समझ आ रहा था कि अछूतों का नेतृत्व एक अछूत ही कर सकता है । वो अम्बेडकर से जुड़ने लगे थे । अम्बेडकर के घर पर लोगों की भीड़ इकट्ठा होने लगी थी । अम्बेडकर ने अछूतों की जरूरत को महसूस करते हुए 9 मार्च , 1924 में ' बहिष्कृत हितकारिणी सभा ' का गठन किया । 

यह भारतीय राजनीति में एक बड़ा कदम था । बहिष्कृत हितकारिणी सभा के जरिये अम्बेडकर पहली बार जन संगठनकर्ता के रूप में उभरे । इसके बाद उन्होंने भारतीय इतिहास में राजनीति और सामाजिक परिवर्तन की जो मिसाल कायम की उससे पूरी दुनिया परिचित है । 

अम्बेडकर , जिनका अगाज़ा इस कदर शानदार था उन्हें भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण व्यक्तित्व बनने से भला कौन रोक सकता था । अम्बेडकर ने न सिर्फ अपनी योग्यता के दम पर अछूतों के नेतृत्व पर कब्ज़ा ज़माने वालों को बाहर किया बल्कि इस मान्यता को भी साकार और सही साबित किया कि अछूतों का वास्तविक नेता एक अछूत ही हो सकता है । उनका उद्धार कोई ऊंची जाति का नेता नहीं बल्कि वो स्वयं ही कर सकते हैं । उनका अगाज़ा हमेशा इस बात के लिए स्मरण किया जाएगा कि उन्होंने नेतृत्व की बागडोर ऊंची जाति के समाज सुधारकों को हाथों में छोड़ने की बजाय एक अछूत के तौर पर स्वयं अपने हाथों में लिया और उसे पूरी जिम्मेदारों के साथ एक बेहतर मुकाम तक पहुंचाया ।

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