ज्योतिबा जीवन कथा ..6


ओतुर गांव के ब्राह्मण और ज्योतिबा..

इस घटना के बारे में पढ़ने के बाद संभवतः आपको एक बार उस समय के सनातनी ब्राह्मणों के बारे में सोचकर हंसी आये । लेकिन गंभीरता से सोचने पर आपको अंदाजा लग जायेगा कि उस समय का समाज ब्राह्मणीय वर्चस्व और जातिवाद से कितनी बुरी तरह ग्रस्त था ।

ओतुर गांव में श्री बालाजी कुसाजी पाटिल नामक एक किसान थे । किसी कारणवश उन्होंने अपने पुत्र के विवाह में गांव के पुरोहितों को निमंत्रण नहीं दिया । इससे गांव के पुरोहित नाराज़ हो गए । इस विवाह के खिलाफ उन्होंने कोर्ट में वाद दायर किया । उन्होंने क्या दावा किया पढ़िए -

' हम यहां के पीढ़ियों के पुश्तैनी पुरोहित हैं । विवाह कार्य करवा देना , तत्सम्बन्धी संस्कार वर-वधु को देना तथा सारे धार्मिक कृत्य करना हमारा अधिकार है । हम इसके लिए तैयार भी थे लेकिन बालाजी पाटिल ने अपनी जाति के पुरोहितों को बुलवा कर विवाह करवाया । यह हमारा अपमान है । वे हमें हमारा अधिकार और दक्षिणा दोनों प्रदान करें '

धीरे धीरे यह खबर पूरे पूना में फैल गयी । पूना के सभी ब्राह्मण , ओतुर के ब्राह्मणों के साथ और बालाजी के खिलाफ हो गए । बालाजी का जीना मुहाल हो गया ।

अंततः उन्होंने ज्योतिबा की शरण ली । ज्योतिबा ने बालाजी की पूरी मदत की । न्यायाधीश के समक्ष बेबाकी से बालाजी के पक्ष में बात रखवाई । परिणामतः पूना के न्यायाधीश ने बालाजी के पक्ष में निर्णय दिया ।

इससे ब्राह्मण वर्ग और अधिक क्रुद्ध हो गया । वह अगली  अपील के लिए बम्बई के सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया । सम्पूर्ण महाराष्ट्र में इस मुकदमें की खूब चर्चा हुई । पूना में सारे ब्राह्मण एक तरफ और गैर ब्राह्मण दूसरी तरफ हो गए । उस समय ज्योतिबा ने गैर ब्राह्मणों का नेतृत्व पूरी जिम्मेदारी और हिम्मत के साथ सम्हाला ।

बहुत बाद में जाकर ज्योतिबा के जीवन के अंतिम वर्षो में जनवरी , 1890 के आसपास सर्वोच्च न्यायालय ने बालाजी पाटिल के पक्ष में निर्णय दिया और इस विवाद का अंत हुआ ।

यह विवाद सत्यशोधक समाज और ज्योतिबा समेत सभी गैर ब्राह्मणों की जीत थी । इसने महाराष्ट्र की सामाजिक आबोहवा बदल के रख दी । आज यह एक सामान्य मामला लग सकता है लेकिन उस दौर में ब्राह्मणीय वर्चस्व के खिलाफ खड़े होना बहुत बड़ा और साहसिक कदम था ।

क्रमशः ...

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