ज्योतिबा जीवन कथा ...4
जब ज्योतिबा को जान से मारने की कोशिश हुई ..
ज्योतिबा के विचार और आचार पचा पाना सनातनियों के लिए संभव नहीं था । वह उनके कार्यों की प्रसद्धि से घबराने लगे थे । उनके लिए अछूतों और महिलाओं का उत्थान समाज का सत्यानाश होना था । इस कुंठा की वज़ह से सनातनी ब्राह्मणों ने ज्योतिबा की हत्या करने की योजना बनाई । उन्होंने शूद्रों के कंधे पर बंदूक रखकर निशाना साधने का सोचा और ज्योतिबा की हत्या के लिए घोंडीराम नामदेव कुम्हार और रौद्रे नामक शुद्र व्यक्तियों को पैसे देकर इस काम के लिए तैयार किया ।
उन्हें आज से लगभग 150 साल पहले ज्योतिबा की हत्या के लिए एक - एक हज़ार रुपये दिए गए थे जिनका मूल्य आज एक करोड़ से कम नहीं होगा ।
निर्धारित किये गए दिन को आधी रात में दोनों ज्योतिबा के घर पहुंचें । घर के भीतर आहट पाकर ज्योतिबा और सावित्री की नींद खुल गयी । उन्होंने सामने देखा तो हाथों में चमचमाते छुरे लिए हुए दो हट्टे कट्टे आदमी खड़े थे ।
" क्या चाहते हो ? " , ज्योतिबा ने पूछा ।
" तुम्हारी जान । "
" क्यों ? क्या मैंने आपका कुछ अहित किया है ? "
" वह बात नहीं है । हमें बस तुम्हे जान से मारने का हुक्म है "
" मुझे मारकर तुम्हें क्या मिलेगा ? "
" एक-एक हज़ार रुपये । "
" अरे ! तब तो जरूर मेरा सिर कलम कर दो । अगर इससे तुम्हारा कुछ भी भला होता है तो मैं क्यों रोड़ा अटकाउं ! जिस गरीब जनता की सेवा में मैंने अपना पूरा जीवन लगा दिया , वही जनता अगर मेरा गला काटना चाहती है तो काट ले । मेरी सारी हयात अछूतों का भला करने में गयी है । अब अगर मेरी मौत से उनका भला होता है तो मैं क्यों रोकूँ , बढ़ो आगे । "
ज्योतिबा की धीर गंभीर और आत्मविश्वासपूर्ण वाणी सुनकर दोनों ने हथियार डाल दिए । उन्होंने ज्योतिबा की अच्छाई के बारे में सुना था । उसे साक्षात देखकर वो ज्योतिबा के चरणों में गिर पड़े और माफी मांगने लगे । ज्योतिबा ने उदारतापूर्वक उनको क्षमा कर दिया ।
उनमें से एक कुछ दिन बाद ज्योतिबा का शरीर संरक्षक बना और दूसरा घोंडी राम कुम्हार ज्योतिबा के सत्यशोधक समाज का प्रबल समर्थक बना ।
ज्योतिबा मन , वचन , कर्म सभी से उदार और न्यायप्रिय थे । इस घटना ने इस बात पर पूर्णतः मुहर लगा दी थी ।
क्रमशः ...
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