ज्योतिबा जीवन कथा...2

2.
विषमता के खिलाफ लड़ाई में ज्योतिबा का सबसे बड़ा हथियार शिक्षा थी । उन्हें पता था कि विषमता के साथ-साथ अन्य सभी लड़ाईयां शिक्षा के दम पर ही जीती जा सकती हैं । जीवन के बाद के वर्षों में , जुलाई 1883 के आसपास वह लिख कर गए हैं  -

" विद्या बिना मति गयी । मति बिना नीति गयी ।
नीति बिना गति गयी । गति बिना वित्त गया ।
वित्त बिना शुद्र गए । इतने अनर्थ , एक अविद्या ने किए । '

ज्योतिबा ने यह लड़ाई पूना से शुरू की । पूना में उन्होंने 1848 के अगस्त महीने में अछूत बच्चों के लिए स्कूल शुरू किया जो महाराष्ट्र ही नहीं , पूरे देश में अपने ढंग का पहला स्कूल था । यह ऐसा काम था जो इस देश के 3000 सालों के इतिहास  में नहीं हुआ था । अछूत समाज के लिए पहला स्कूल ज्योतिबा के कारण खुल सका ।

यह तो स्पष्ट था कि ज्योतिबा के उस स्कूल में शुद्र या अतिशूद्र जाति के लड़के या लड़कियां ही आती थीं , लेकिन असल प्रश्न यह था कि उन्हें पढ़ायेगा कौन ? उस समय पाठशालाओं के शिक्षक बिना किसी संकोच के जाति भेद का पालन करते थे । लड़कों के बैठने की व्यवस्था उनकी जाति श्रेष्ठता के अनुसार की जाती थी । निम्न वर्ण के लड़के उच्च वर्ण के लड़कों के साथ बैठकर नहीं पढ़ सकते थे । लड़कियों की स्थिति तो और भी बदतर थी । उनके लिए विद्यालय जाना तो दूर घर से बाहर निकलना भी मुश्किल था । लिहाज़ा ज्योतिबा ने सभी विद्यार्थियों को अकेले पढ़ाने का निर्णय लिया । यह उस दौर के भारत में उठाया गया बेहद क्रांतिकारी कदम था । लेकिन यह सभी को रास नहीं आया । 

पूना के सनातनी ब्राह्मणों को ज्योतिबा का इस तरह अछूतों के लिए स्कूल खोलने बिल्कुल पसंद नहीं आया । उनके मत में यह घोर अधर्म था । उन्होंने ज्योतिबा की कड़ी टिका टिप्पणी की । उन्हें भला बुरा कहा । समाज से बहिष्कृत करने की धमकी दी । लेकिन ज्योतिबा टस से मस न हुए ।

जब ज्योतिबा पर इन सब बातों का असर नहीं हुआ तो ब्राह्मणों द्वारा उनके पिता को निशाना बनाया गया । उनको ताने दिए गए , उनकी घोर निंदा की गई -

" तुम्हारा लड़का धर्म और समाज के लिए कलंक है । उसकी पत्नी भी निपट निर्लज्ज और मर्यादाहीन है । दोनों समाजद्रोही और धर्मद्रोही हैं । उनके व्यवहार के कारण तुम पर परमात्मा का कोप होगा । अच्छा होगा कि दोनों को घर से बाहर निकाल दो "

गोविंदराव रोजाना यह सब ताने सुनकर दब गए । उन्होंने ज्योतिबा के सामने प्रस्ताव रखा -

" या तो स्कूल छोड़ो या घर ! "

ज्योतिबा को अपने लक्ष्य से हटना कतई मंजूर नहीं था । वह बिना देर किए फौरन घर छोड़ने की बात पर राजी हो गए । पिता इस दृढ़ता को देखकर तिलमिला उठे ।

उन्होंने इस बार और गहरी चोट की  - ' अगर ऐसा है तो अपनी पत्नी को भी ले जाओ , मैं तुम्हारी पत्नी को अपने घर में नहीं रख सकता । '

ज्योतिबा के लिए वह दिन बहुत दुखदायी था । उन्होंने दुखी मन से पिता का घर छोड़ दिया । अब तक पिता का साया होने की वजह से उन्हें रहने और खाने की समस्या नहीं थी । लेकिन घर से बाहर कदम रखते ही ज्योतिबा को खाने के लाले पड़ने लगे । उन्होंने कई दिन तक आधे पेट तो कई दिन  बिना खाये बिताए । काम धंधे की खोज में व्यस्तता के कारण ज्योतिबा को स्कूल का काम छोड़ना पड़ा । आठ नौ महीनों तक चलने के बाद स्कूल भी बंद हो गया । यह ज्योतिबा के लिए बेहद मुश्किल समय था । संभवतः यह आगामी चुनौतियों के लिए उनकी परीक्षा थी , जिसका वह डटकर सामना कर रहे थे ।

क्रमशः...

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