ज्योतिबा..जीवन कथा 1
ज्योतिबा फुले स्कॉटिश मिशन के अंग्रेजी स्कूल में पढ़े लिखे व्यक्ति थे । उनकी जितनी पढ़ाई थी उससे उस दौर में अंग्रेजी सरकार के अधीन नौकरी पाना आसान था । लेकिन उन्होंने कभी भी जीवन यापन के लिए सरकारी नौकरी का चुनाव नहीं किया ।
ज्योतिबा के अच्छे स्कूल में पढ़ने के कारण कई ब्राह्मण , क्षत्रिय , कायस्थ और मुसलमान उनके दोस्त थे । अपनी युवावस्था में एक बार वह अपने एक ब्राह्मण मित्र की बारात में शरीक होने गए । वहां वह पहली बार जातिगत भेदभाव के अपराध का शिकार हुए ।
शुद्र माली जाति का लड़का ब्राह्मणों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले , इसे ब्राह्मण भला कैसे बर्दास्त कर सकते थे । उस दिन ज्योतिबा का गिरेबान पकड़कर एक ब्राह्मण ने टोका ...
" शर्म नहीं आती ? शुद्र कहीं के..ब्राह्मणों के साथ चलते हो..जातिपाँति की कोई मर्यादा है या नहीं ? या सब कुछ ताक पर रख दिया है ? हटो यहां से...सबसे पीछे चलना और आगे मत आना. बहुत बेशर्म हो गए हैं ये लोग आजकल. '
ज्योतिबा पर मानों बिजलियाँ गिर पड़ी । वह हक्केबक्के रह गए । कोई उन्हें इस तरह प्रताड़ित कर सकता था , उन्हें विश्वास नहीं हो पा रहा था । इतना अपमान , ऐसी घृणा..बिना एक क्षण रुके वह फौरन घर लौट गए ।
गुस्से में उफनते हुए उन्होंने पूरा वाकया अपने पिता को सुनाया । उन्हें लगा वो कुपित होंगे , लाठी लेकर अपमान का बदला लेने चलेंगे , लेकिन ऐसा नहीं हुआ । उनके पिता गोविंदराव भी परंपरा के गुलाम थे । धर्मभीरु और रूढ़िप्रिय थे । उन्होंने उल्टे ज्योतिबा को समझाना शुरू किया -
" गनीमत समझो कि उन्होंने तुम्हें डांट-डपट कर छोड़ दिया. हम जाति से शुद्र हैं. हम उनकी बराबरी कैसे कर सकते हैं ? गैर ब्राह्मणों का पेशवाओं के राज में भी अपमान होता था. उन्हें हाथी के पैरों तले कुचल देते थे. तमाम तरह की यातनाएं देते थे. न्याय ब्राह्मणों का पक्षधर था..
आज तुमने जो कुछ किया वह पेशवाओं के राज में करते तो तुम्हें कड़ी सज़ा होती "
ज्योतिबा लगातार उनकी बात सुनते रहे और उनके सामने दागदार सच्चाइयों के पर्दे खुलते रहे । उनका अपने पिता की बात से होने वाला दोहरा दुख कम होने लगा । उन्हें समझ आने लगा कि राजनीतिक गुलामी भीषण जरूर थी , लेकिन उसकी कोई सीधी आंच सामान्य लोगों पर नहीं आती थी । परंतु सामाजिक विषमता की आग तो आदमी को जिंदा जलाने वाली थी । मनुष्य की आत्मा को तिल तिल कर मारने वाली थी । अगर लड़ना ही है तो इस जानलेवा बीमारी से लड़ना होगा ।
जोतिबा के सामने भविष्य का रास्ता खुलता हुआ दिखाई देने लगा । उस दिन उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि अब आगे चलकर बस एक ही काम करना है , जाति भेद के खंभों पर खड़े विषमता के महल को पूरी ताकत के साथ ढहा देना है ।
क्रमशः ...
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